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Thursday, 9 August 2018

यहां जन्म लेने के बाद दरवाजे से नहीं, दीवार में छेद कर बच्चे को निकाला जाता है कमरे से बाहर


सत्येंद्र सिंह, गिरिडीह/धनबाद। धनबाद से सटे गिरिडीह जिले में एक प्रखंड ऐसा भी है, जहां बच्चे के जन्म के बाद उसे कमरे के दरवाजे से नहीं, बल्कि दीवार में छेद कर बाहर निकाला जाता है। परंपरा जान ले रही है, लेकिन लोग आज भी इसे मान रहे हैं। बात हो रही है जिले के सरिया स्थित अमनारी यानी बिरहोर टंडा की। यहां करीब ढाई दर्जन बिरहोर रहते हैं। विलुप्त हो रही बिरहोर जनजाति के लोग खुद भी अपना अस्तित्व बचाए रखने को प्रयासरत हैं। वे शादी भी अपने परिवार या समुदाय में ही करते हैं, लेकिन परंपरा के नाम पर इस तरह की दकियानूसी प्रथाएं नवजात की जान ले रही हैं।

10 साल में एक भी संस्थागत प्रसव का रिकॉर्ड नहींसरकार की ओर से सरकारी अस्पतालों में प्रसव कराने के लिए स्वास्थ्य विभाग पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की बैठक में सिविल सर्जन को महिलाओं का प्रसव अस्पताल में कराने के लिए बार-बार निर्देश मिलता है। स्वास्थ्य विभाग के साथ ही समाज कल्याण विभाग के कर्मियों को भी इस अभियान में शामिल किया गया है। इसके बावजूद बिरहोर महिलाओं का प्रसव अस्पताल में कराने का कोई रिकॉर्ड नही है। संस्थागत प्रसव के लिए सरकार इलाज का खर्च उठाती है। प्रोत्साहन राशि का भुगतान भी किया जाता है। इसके बावजूद पिछले 10 साल में एक भी बिरहोर महिला का संस्थागत प्रसव नहीं कराया जा सका है।
        सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बीएन झा ने बताया कि आज भी परंपरा के नाम पर बिरहोर प्रसूता को अस्पताल लाने से कतराते हैं, जबकि यही परंपरा कई बार नवजात की जान पर भी बन आती है। विलुप्त हो रही इस जनजाति के लोगों के घरों में आज भी बच्चे के जन्म के समय अजीब ढंग की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। महिलाओं का प्रसव घर में कराया जाता है। प्रसव करने के बाद नवजात को घर के दरवाजे से निकालने के बजाय उसे उस घर की दीवार को एक कोने को तोड़कर छेद बनाकर उसी छेद से बच्चे को बाहर निकाला जाता है। जब तक उस बच्चे के साथ प्रसूता को नहाया नहीं जाता, तब तक बच्चे के साथ ही प्रसूता को भी उसी स्थान पर सुलाया जाता है।
नहाने के बाद पास के जंगल में कराई जाती भूत की पूजापरंपरा के अनुसार, प्रसूता व बच्चे को नहलाने के बाद पास के जंगल में ले जाकर भूत की पूजा कराई जाती है। पूजा के बाद खाने-पीने की व्यवस्था भी यहीं की जाती है। यहां जो खाना बच जाता है, उसे घर लाने की बजाय वहीं गाड़ दिया जाता है। हाल ही में प्रसव कराने वाली कमली देवी व मुनिया देवी कहती हैं कि उनका समाज पौराणिक परपरा का निर्वहन कर रहा है। अगर बच्चे को इस परंपरा के अनुसार, बाहर नहीं निकालते हैं तो उसका भूत गड़बड़ा जाता है। इससे बच्चे की पूरी जिंदगी खराब हो जाती है। इसी समाज की बुजुर्ग महिला नरिया मसोमात बताती हैं कि चंगेरिया (नवजात) को दीवार काटकर बाहर निकाला जाता है। नहाने के बाद चेंगना पाठा (कबूतर) काटकर पूजा की जाती है।

             परंपरा पड़ रही जान पर भारी
नवजात को दीवार के छेद से बाहर निकालने में कई बार उसकी बात उसकी जान पर बन आती है। इसके बाद भी न तो बच्चे को अस्पताल ले जाया जाता है और न ही कोई दवा दी जाती है। मुनिया देवी ने बताया कि उसने जन्म दिया आठ बच्चे को, लेकिन जीवित हैं पांच। तीन की मौत हो चुकी है। बताया कि पास में ही आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन किया जाता है। उसकी सेविका कभी-कभार आकर दवा दे जाती है। वहीं, सीडीपीओ अनीता देवी का कहना है कि इस समाज की महिलाएं कोई दवा भी नहीं खाती। इसके साथ ही अन्य जो भी उपलब्ध कराया जाता है, उसका उपयोग करने की बजाय उसे बेच देती हैं।
''आज भी बिरहोर अंधविश्वास में जी रहे हैं। बच्चे के जन्म लेने के बाद दीवार तोड़कर उसे कमरे से बाहर निकाला जाता है। इससे कई बार बच्चों की मौत भी हो जाती है। अशिक्षा के कारण भी वे ऐसा करती हैं। उनकी सोच को बदलने की जरूरत है। सरकारी योजनाओं का लाभ वे नहीं लेती हैं।'' 
-अनीता देवी, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, सरिया।